The longing of Laxman – An excerpt from Kurukshetra Yuddha-2, Ardhasatya

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दुर्योधन के जाने के पश्चात्‌ लक्ष्मण बहुत देर वहीं उसके तम्बू के बाहर खड़ा रहा। चहुँ ओर से उसे सन्तुष्ठ क्षत्रियों के स्वर सुनाई देने लगे। सम्शप्तकों की प्रतिज्ञा से आश्वस्त वे योद्धा फिर से मदिरा और स्त्रियों में मग्न हो गए जैसे पौ फटते ही सम्शप्तकों के हाथों अर्जुन मारा जाएगा। लक्ष्मण का मन अब भी उद्विग्न था। उसे ऐसे किसी सानिध्य की आशा थी जो उसे वैसे ही ज्ञान की बातें बताएं जैसे भीष्म बताते थे। किन्तु बहुत सोच कर भी उसे किसी भी क्षत्रिय का दामन इतना पवित्र नहीं जान पड़ रहा था जितना भीष्म का था। भीष्म के सानिध्य में मिलने वाला ज्ञान और शान्ति कदाचित्‌ उनके अनुभव और आयु का ही प्रभाव होगा, लक्ष्मण ने सोचा।

पितामह अकेले ही तो वयोवृद्ध और अनुभवी योद्धा नहीं थे। कौरवों के इस शिविर में पितामह से भी वृद्ध योद्धा हैं।

यही सोचकर वह तेजी से डग भरता हुआ यहाँ वहाँ देखने लगा। सभी योद्धा यहाँ वहाँ जा रहे थे। सभी ने केवल अन्तरीय पहना था और युद्ध के घावों पर रात्रि की हवा लगने दे रहे थे। कुछ योद्धा अग्नि के समक्ष बैठे मदिरा पान कर रहे थे कुछ अपने तम्बुओं में आनन्द ले रहे थे।

लक्ष्मण ऊँचा ऊँचा सिर करता हुआ आगे बढ़ता गया। उसे जिनकी तलाश थी उन्हे ढूँढने के लिए उसे ऊँचा ही देखना होगा। अचानक उसे दूर कहीं तम्बुओं के पीछे बालों से भरा हुआ एक सिर दिखा जो हिल रहा था। और उसी स्थान से कर्णभेदी चिंघाड़ने की आवाजें आ रहीं थी। लक्ष्मण उसी ओर बढ़ा। वहाँ पहुँच कर उसने देखा। बहुत सारे हाथियों को वहाँ रखा गया था और उनके घावों पर लेप किया जा रहा था। उन सभी हाथियों में एक हाथी सबसे अधिक विशाल था। उसी का सिर उसे तम्बुओं के पीछे से दिख रहा था। वह बैठा हुआ भी किसी रथ की ऊँचाई से ऊँचा दिख रहा था। उस हाथी का नाम सौप्तिक था। उस हाथी को उसके स्वामी महाराज भगदत्त अपने हाथों से उसे भोजन करा रहे थे।

लक्ष्मण ने देखा सौप्तिक के निकट ही अनेकों हाथियों को रखा गया था और बहुत से योद्धा उन हाथियों पर चढ़कर उन पर बैठने का अभ्यास कर रहे थे।

उसने देखा कि उसके काका दुर्मषण और दुर्मुख भी एक एक हाथी पर बैठे थे। सभी जानते थे दोनों ही कौरव भाई हाथियों की पीठ पर बैठ कर युद्ध करने में कुशल थे। उनके ठीक नीचे गान्धार के वीर योद्धा अचल और वृषक खड़े थे। उन्होने जैसे ही लक्ष्मण की ओर देखा वे मुस्कुराने लगे।

लक्ष्मण!” अचल ने कहा देखो अपने काका को, हाथी पर यूं चढ़े बैठे हैं जैसे कोई बालक हों।

लक्ष्मण उनके निकट आया। उसने अचल और वृषक से पूछा ये सब क्या है? क्या कल के व्यूह में गज सेना सबसे आगे होगी?”

वृषक ने कहा आचार्य ने अर्जुन को दूर रखने के लिए सम्शप्तकों को तैयार कर लिया है। अर्जुन के पश्चात्‌ यदि कोई धर्मराज युधिष्ठिर की आचार्य से रक्षा में सक्षम हैं तो वो हैं भीम। भीम और उसके राक्षस पुत्र घटोत्त्कच को उलझाने के लिए आचार्य ने गज सेना को आगे रखने को कहा है। तुम्हारे काका दुर्मषण और दुर्मुख दोनों ही गज सेना का संचालन कर सकते हैं। वे उस सेना का नेतृत्त्व करेंगे। मैं और अचल इसी सेना के साथ का भाग बनकर सहस्त्रों रथों द्वारा इसकी रक्षा करेंगे।

भीमसेन ने कलिंग की गज सेना का अकेले ही सफाया कर दिया थालक्ष्मण ने याद दिलाया।

किन्तु इस बार नहीं लक्ष्मण !” दुर्मषण ने हाथी पर बैठे हुए चिल्लाते हुए कहा इस सेना के यूथपति को भीमसेन हरा नहीं पाएगा।

लक्ष्मण ने पलट कर भगदत्त की ओर देखा। सभी जानते थे कि भगदत्त गजसेना के सबसे कुशल सेनानायक हैं। वे अनुभवी हैं और उनका हाथी सौप्तिक अन्य सभी हाथियों का राजा सा दिखता है।

महाराज भगदत्त के हाथी के पैरों के नीचे आकर कल भीमसेन पिस जाएगा लक्ष्मण !” दुर्मुख ने चिल्लाते हुए कहा।

लक्ष्मण फिर वहाँ से भगदत्त की ओर बढ़ा। निकट पहुँच कर उसने देखा कि भोजन करके सौप्तिक अब सुस्ता रहा था। वह अपना सिर भूमि से टिका कर बैठा था। उसकी लम्बी सूंड किसी बहुत बड़े अजगर की भांति भूमि पर लहरा रही थी। भगदत्त थक कर सौप्तिक के निकट ही एक बड़े से पत्थर पर बैठ गए। सौप्तिक अपने बड़े बड़े कानों को हिलाकर भगदत्त को मानो हवा दे रहा था।

महाराज भगदत्त को दुर्योधन पुत्र लक्ष्मण का प्रणामलक्ष्मण ने भगदत्त को प्रणाम करते हुए कहा अब आप अपने तम्बू में जाकर विश्राम कर लीजिए महाराज!”

भगदत्त कुछ पल बिना कुछ बोले सामने की ओर देखते रहे।

लक्ष्मण ने एक पल के लिए सोचा कि भगदत्त ने कदाचित्‌ उसे सुना ही नहीं। किन्तु इससे पहले कि वह कुछ कहता भगदत्त का स्वर गूंज उठा मैं पहाड़ी व्यक्ति हूँ राजकुमार, पत्थरों पर बैठने पर ही मखमली आसन का अनुभव होता है।लक्ष्मण ने देखा। भगदत्त की वह छवि अत्यन्त भव्य दिख रही थी। मानो वे प्राग्ज्योतिष में अपने सिंहासन पर बैठे हों और उनके सेवक उन्हे पंखा दे रहे हैं। उनके सिर की पट्‍टी किसी पगड़ी के समान दिख रही थी। उस पट्‍टी से उनके माथे के बल कसे रहते थे। अन्यथा वह बल उनकी आँखों पर गिर जाएं और उन्हे दिखना बन्द हो जाए। लक्ष्मण ने सोचा कि भारतवर्ष के सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक महाराज भगदत्त को अपनी शक्ति का तनिक भी अभिमान नहीं है। उनके ये उच्च विचार उनकी इतनी आयु और अनुभव ने ही तो उन्होने दिए हैं। कदाचित्‌ पितामह के सानिध्य की कमी उनसे बातें करके पूरी हो जाए।……………………

(A sneak peek into my upcoming book “Kurukshetra Yuddha, Part-2, ‘Ardhasatya'”)

bhagadatta

 

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About Mrinal Rai

I am a story teller. My unconscious self works a 9 hours a day in IT paying my due credits to my educational qualifications (read degrees). My conscious self is always busy 24X7 weaving new stories and trying to find out ways to tell them. I have authored a book, drawn few comic books, graphic novels and more are on the way :)
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